पुरालेखागार
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"आदिवासी लोक कला, संस्कृति एवं परम्परा” विषय पर केन्द्रित विशेषांक
खंड 38 No. 121 (2025)में जहाँ दिखाना है वहाँ पेस्ट करें -->
जन–जून 2025 (अंक-121, वर्ष 38) में आदिवासी लोक कला, संस्कृति एवं परंपरा के विविध अनुभवों को शोधात्मक और रचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
यह अंक न केवल आदिवासी सांस्कृतिक विरासत के गहन अवलोकन का अवसर प्रदान करता है, बल्कि आधुनिक अकादमिक विमर्श और रचनात्मक संवेदनाओं के संगम के माध्यम से पाठकों को सामुदायिक अनुभवों से जोड़ता है।
सामग्री-सूची
संपादकीय
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आदिवासियों की अमूल्य एवं अद्वितीय धरोहर है लोक संस्कृति – प्रो. जनक सिंह मीना (पृ. 03)
लोकगीत
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‘पद माँ की ममता और कलयुगी कपूत’ – डॉ. महेश मीना सलेमपुर (पृ. 05)
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‘कन्हैया रचयिता एवं गायन के पुरोधा’ – प्रो. जनक सिंह मीना (पृ. 08)
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‘ढूँढाड़ी लोकगीतों में परिवेश, रिश्ते और कूदत की परख’ – डॉ. छोटू राम मीणा (पृ. 22)
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‘आदिवासी लोक प्रदर्शन कला: कन्हैया दंगल’ – आशाबाई मीना एवं डॉ. जिज्ञासा मीना (पृ. 31)
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‘लोकदेवों के लोकगीत’ – डॉ. छोटू राम मीणा (पृ. 39)
शोध-पत्र
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‘पारंपरिक मूल्य को बचाए रखने की चुनौतियाँ: जनजातियों के लिए एक अध्ययन’ – डॉ. मीना रामनिवास वर्मा (पृ. 45)
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‘अदृश्य से दृश्य तक: आदिवासी चेतना और हिंदी कथा साहित्य’ – डॉ. कृष्णासिंह मीना (पृ. 49)
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‘आदिवासी कला, संस्कृति एवं परंपरा’ – डॉ. रजनी रंजन (पृ. 54)
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‘गुजरात के आदिवासी समुदायों के प्रमुख संगीत वाद्य का अध्ययन’ – राठवा मितलबेन जशवंतभाई (शोध छात्र) (पृ. 59)
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‘कर्म पर्व संस्कृति के अंग’ – प्रतिमा प्रसाद ‘कुमकुम’ (पृ. 70)
कहानी
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‘बुआ कंचनी’ – हरिराम मीरा (पृ. 73)
कविता
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‘विजय राही की कविता’ – (पृ. 88)
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"आदिवासी संस्कृति ” विशेषांक
खंड 123 No. 38 (2025)कहाँ क्या है?
संपादिकीय 1. विनाश काले विपरीत बुद्धि एवं सोच के सप्त सोपान - प्रो. जनक सिंह मीना
शोध पत्र
- संताल हूल के नायक सीडो कान्हू के सपने और वर्तमान सामाजिक राजनीतिक संकट - अशोक सिंह
- अब जनक्रांति ही भ्रांति में क्यों बदल गई है? - डॉ. धर्मचंद विद्यालंकार
- मिटती आवाज़ें, बदलते रंग: वैश्वीकरण में आदिवासी विरासत का संकट - मीनाक्षी
- एलिस एक्का की कहानियों में अभिवक्त सामाजिक -सांस्कृतिक चित्रण - छोटी मीना
- समकालीन हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जीवन संघर्षों की अभिव्यक्ति - दीपेश शुक्ल
- आदिवासी जनजीवन एवं पर्यावरण : एक विहंगवलोकन - आनंद तिवारी
- जनजातीय की संस्कृति एवं परंपरा - डॉ. पूनम सहाय
- आदिवासी समुदाय उरांव की प्रकृति से सहर्चय की संस्कृति - सिद्धांत यादव
- अनुज लगुन की कविताओं में आदिवासी संस्कृति और जीवन संघर्ष - वसवा अतुलभाई गोपालभाई
- झारखंड की आदिवासी चेतन और हिंदी साहित्य में उसकी अनुगूंज - अभिषेक कुमार मीना
कहानी
- पिंजड़ा - डॉ. पूरनसिंह
कविताएँ
- आदिवासी की चेतना - डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन
- कल्पना गवली की पाँच कविताएँ - बदल गया हूँ/मोड़ पर/मातृभाषा/ चावल/ बोली
गीत
- राजा भरथरी -डॉ. छोटूराम मीणा
- रामदयाल महेश के दो गीत
पुस्तक समीक्षा
1. कहानी की शास्त्रीयता से लबालब है "फुलवा" - मुकेश पोपली
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"आदिवासी लोक कला, संस्कृति एवं परम्परा” विषय पर केन्द्रित विशेषांक"
खंड 38 No. 122 (2025)सामग्री-सूची
संपादकीय
1. आंटा -सांटा एक कुप्रथा – प्रो. जनक सिंह मीना (पृ. 03)
आलेख/शोध-पत्र
1. आदिवासी के जीवन की समस्याओं का पर्याय ‘आदिवासी की मौत’ – डॉ. बीना भद्रेशकुमार प्रजापति (पृ. 05)
2. मीणा जनजाति के लोकगीतों का संरक्षण और संवर्धन : चुनौती एवं समाधान – सुमेर सिंह मीना (पृ. 14)
3. गोंडजनों का देवजात्रा मंदीपखोल – प्रीतम सिंह मेरावी (पृ. 28)
4. ‘हिंदू-जैन सांस्कृतिक समन्वय का परिचालक- श्रीमहावीरजी मेला (करौली)- डॉ. शिल्पी गुप्ता (निर्देशिका), अभिलाषा मीना (शोधार्थी) (पृ. 32)
5. झारखंड राज्य का जनजातीय पर्व त्योहार सरहुल – डॉ. पुष्कर बाला (पृ. 38)
6. लोकगीत गाने वाली मीणा जनजाति की महिलाओं में सुख का स्तर : एक तुलनात्मक अध्ययन – वर्षा मीणा, डॉ.संतोष मीना (पृ. 40)
7. आदिवासी पत्रकारिता में फीडबैक – डॉ. रूपचंद गौतम (पृ. 56)
कहानी
1. पहाड़ों के किनारे गाँव में प्रकृति ही सब कुछ थी – जीवन, धर्म और संस्कार – अंकिता बहन, गोविंद भाई पटेल (पृ. 70)
पुस्तक समीक्षा
1. ‘रहना नहीं देश बिराना है ‘ : विजय सिंह मीणा – डॉ. हीरा मीणा – (पृ. 72)
कविताएँ एवं गीत
1. डॉ. सन्दीप कुमार सिंह की कविता (पृ. 79)
2. अशोक सिंह के गीत (पृ. 81)